About उदयरामसर
उदयरामसर पश्चिमी राजस्थान के जिला बीकानेर में स्थित भगवान दत्तात्रेय के उपासक "दांतत्रता" गोत्रीय चंद्रवंशी अहीर क्षत्रियों का एक विशाल ठिकाना है।
Historical Significance
बीकानेर में यादवों के गढ़ उदयरामसर का इतिहास :
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उदयरामसर पश्चिमी राजस्थान के जिला बीकानेर में स्थित भगवान दत्तात्रेय के उपासक "दांतत्रता" गोत्रीय चंद्रवंशी अहीर क्षत्रियों का एक विशाल ठिकाना है।
थार के रेगिस्तान की गोद में पाकिस्तान के एकदम सीमा पर बसे बीकानेर शहर में ज़िन्दगी बहुत ही कठिनाई भरी है।
यहां की तपती धरा की कोख से कई वीर, महावीर अंकुरित हुए।
उन्ही में से एक है इस गांव के रणबांकुरे जिनकी सरदारी की सरपरस्ती में बीकानेर और बीकानेर वासी सदैव अमन चैन से रहे।
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इतिहास : :
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यदुवंशियों के दांतत्रता कबीले के जंगजू शुरू से यानी बीकानेर की स्थापना से ही सूर्यवंशी राठोड़ महाराजाओं के विश्वसनीय, बहादुर एवम् सम्मानित सरदार एवम् सामंत रहे हैं।
1480 में बीकानेर की जब स्थापना हुई महाराज राव बीका सिंह राठौड़ के द्वारा तब कहा जाता है कि यहां निवास कर रहे जाटों के " गोदारा", "जाखड़" आदि कबीलों के लोगों ने अशांति फैलाना शुरू कर दिया था।
तब महाराजा बीका सिंह के आग्रह पर उनके दांतत्रता सरदार ने अपने कबीले के योद्धाओं संग मिलकर जाट विद्रोहियों द्वारा फैलाई अशांति और विद्रोह से लोहा लेते हुए सबको मौत के घाट उतार दिया था।
और तभी से बीकानेर रियासत की शाही सेना के प्रधान सेनापति, युद्ध विशेषज्ञ आदि सम्मानित पद की कमान दांतत्रता वीरों को मिली और इनके सम्मान में कई गांव इन्हे जागीर के तौर पर अता फरमाए गए।
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महाराज बीका सिंह , जोधपुर के संस्थापक राव जोधा के सुपुत्र थे। अतः दोनों राठौड़ घराने एक ही वंश के थे जिनके पूर्वज मूलतः उत्तर प्रदेश के कन्नौज से विस्थापित होकर इधर आए थे ।
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ज्यों ही उदयरामसर में हम प्रवेश करते हैं सहसा ही नज़रें वहां अश्व पर सवार, भाला लिए एक विशाल प्रतिमा पर आ टिकती जिसके नीचे लगे शिलालेख पर अंकित है ( वीर उदय सिंह) ।
दरअसल उदय सिंह इस उदयरामसर गांव की स्थापना अपने नाम पर विक्रम संवत 1789 को चैत्र माह के अष्टमी के दिन करी और जिनसे आबाद हुई उनकी दांतरता अहीर नस्ल ।
सरदार उदय सिंह, बीकानेर नरेश महाराज अनूप सिंह के सब विश्वसनीय सरदार और सलाहकार थे।
सरदार उदय सिंह की दो रानियां थी। पहली रानी चंद्रवंशज यदुवंशी अहीर क्षत्रानी थीं तथा दूसरी रानी बीकानेर रियासत के ही एक सूर्यवंशी राठौड़ सरदार की सुपुत्री थीं।
इनके ज्येष्ठ रानी अहीर क्षत्रानी से चार ज़ोरावर पुत्र हुए : किशन दास , सुंदर सिंह तथा दो का नाम अज्ञात है । चारों वीर पुत्र बीकानेर राज्य के उच्च पदों पर काबिज हुए।
और दूसरी पत्नी जो राठौड़ थीं उनसे भी इन्हे पुत्र रत्न हुए।
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सरदार उदय सिंह ने आजीवन अपनी निष्ठा, सूझबूझ और वीरता से बीकानेर को सुरक्षित रखा।
उन दिनों सभी रियासतों में आपस में काफी रस्सा कसी और संघर्ष हुआ करता था।
उन्ही दिनों सत्ता के लालसा में बीकानेर महाराज के एक दासी पुत्र वनमालीदास राठोड़ ने राष्ट्रद्रोह कर दिया।
उसने दिल्ली जाकर मुस्लिम धर्म तक स्वीकार कर लिया था, और वह पांच हजार मुस्लिम घुड़सवारों समेत बीकानेर राज्य का पट्टा दिल्ली से अपने नाम
लिखवा लाया।
वनमाली दास ने बीकानेर के बाहर मन्दिर के सामने मुर्गे और बकरे कटवाये।
बीकानेरी सिपाही समझाने गये तो उन्हें कैद कर लिया, और
कहा:
" तुम बकरों की बात करते हो मैं तो मुसलमान हूं
कल यहां गोवध भी करवाऊंगा"।
राजा अनूपसिंह सकते में आ गए कि आखिर क्या करें?
अंग्रेज लेख मेजर पाउलट लिखता है: "उस विषम दौर में कोई सूर्यवंशी राजपूत, राजा अनूप सिंह की मदद के लिए उनके संग खड़ा नही हुआ क्योंकि सभी दम साधे, जो
जीतेगा उसी का पक्ष लेने को। उस समय वीर उदय सिंह
सामने आया और परिस्थिति की गंभीरता को भांप अपनी बुद्धिमता से योजना बनाई और बड़ी चतुराई और वीरता पूर्वक वनमाली दास का काम तमाम कर बीकानेर की लाज रख ली"।
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सरदार उदय सिंह के वंशजों ने भी अपनी साख और धाक बरकरार रखी।
उदय के छोटे सपूत और सुंदर सिंह के पौत्र हुए वीरवर गंगा सिंह जी।
दांतत्रता सरदार सुंदर सिंह के पौत्र श्री गंगा सिंह जी का नाम हमेशा से बीकानेर घराने में बड़े आदर से लिया जाता है।
विलक्षण पराक्रम के धनी सरदार गंगा सिंह को आला दर्जे की तलवारबाज़ी, घुड़सवारी के हुनर इनके जंगजू पूर्वजों से विरासत में मिली।
⚔️ इनके साथ बीकानेर का वो गौरवमई इतिहास जुड़ा है जो आज भी यहां के लोग बड़े फक्र से याद करते हैं ।
बीकानेर के महाराज राव राज सिंह उर्फ रायसिंह द्वितीय के समकालीन सरदार गंगा सिंह को राजा ने जैसलमेर के पोखरण भेजा शांति वार्ता के लिए।
उन दिनों जैसलमेर रियासत और बीकानेर के राज्य के बीच जबरदस्त संघर्ष होता था।
दोनों आेर से घुसपैठ हुआ करती थी।
एक बार जैसलमेर वाले बीकानेर के मवेशी खदेड़ ले गए थे। जिसे लेकर खूनी संघर्ष हुआ और बीकानेर वाले वापस अपने मवेशी लेकर लौट आए।
बार बार आपसी संघर्ष के चलते बीकानेर महाराजा रायसिंह द्वितीय ने गंगा सिंह जी को शांति वार्ता के लिए पोकरण भेजा बीकानेर का प्रतिनिधित्व करते हुए।
गंगा सिंह अपने एक दर्जन हथियारबंद बहादुरों संग लश्कर लेकर पोकरण पहुंचे।
लेकिन जैसलमेर के भाटी शांति वार्ता के पक्ष में नहीं थे तथा वार्ता के बहाने 150 सैनिकों की टुकड़ी लेकर वहां पहले से मौजूद थे।
गंगा सिंह जी की ओर से लाए शांति प्रस्ताव जब विफल हो गया तब जैसलमेर की सैन्य टुकड़ी ने गंगा सिंह और उनके एक दर्जन शूरवीर योद्धाओं को घेर लिया।
साहसी और शेर का कलेजा रखने वाले गंगा सिंह ने सकुशल नेतृत्व करते हुए अपने मात्र एक दर्जन योद्धाओं के साथ मिलकर जैसलमेर की 150 सैनिकों की टुकड़ी को काट डाला।
उन दिनों गणगौर का पर्व चल रहा था।
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गणगौर राजस्थान में आस्था प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का सबसे बड़ा उत्सव है। गण (शिव) तथा गौर(पार्वती) के इस पर्व में कुँवारी लड़कियां मनपसंद वर पाने की कामना करती हैं। विवाहित महिलायें चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजन तथा व्रत कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
पुराने समय में राजस्थान की सभी रियासतों में एक तरह से होड़ मची रहती गणगौर के पर्व को सबसे भव्य तरीके से मनाने की। इस पर्व में उन दिनों सभी रियासतों के राजघरानों में गौरी मां पार्वती की मूर्ति स्थापित की जाती थी और मूर्ति को हर राजघराना अपने सामर्थ्य के अनुसार जितना हो सकता था उतना स्वर्ण, हीरे, मोती आदि से बने बेशकीमती आभूषणों से सज्ज करते थे साथ ही एक बड़ा मांगलिक ढोल भी स्थापित किया जाता था।
ये पर्व हर राजघराने की एक तरह से साख और इज्ज़त का प्रतीक था!
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फिर क्या था कुछ दूर पोकरण में ही जैसलमेर राजघराने की आन बान शान गणगौर स्थापित था।
जैसलमेर पर विजय के प्रतीक के रूप में सरदार गंगा सिंह ने मां पार्वती और भगवान शिवशंकर की उपासना कर अपने योद्धाओं संग मिलकर तलवार की धाक पर जैसलमेर की गणगौर और उनका मांगलिक ढोल उठा लाए थे बीकानेर।
⚔️राजदरबार में बैठे महाराज रायसिंह राठौड़ को जब सूचना मिली कि शांति वार्ता विफल होने पर सरदार गंगा सिंह ने जैसलमेर वालों को धूल चटा, ज़बरदस्ती उनकी गणगौर उठा लाए हैं तब महाराजा रायसिंह बहुत प्रसन्न हुए और जैसे ही भरे दरबार जब गंगा सिंह अपने साथियों संग गणगौर ले पधारे तब अपने गद्दी पर विराजमान महाराजा रायसिंह ने स्वयं राजगद्दी से आधा उठ , सरदार गंगा सिंह की वीरता को सलाम किया था।
उस दौरान दरबार में मौजूद सभी सामंतों ने जयजयकार लगाई " शिव पार्वती की जय, बीकानेर की जय, महाराजा रायसिंह की जय और सरदार गंगा सिंह अमर रहे"।
इस विजय के पश्चात बीकानेर महाराजा राजसिंह ने गंगा सिंह जी के पूर्वजों की जागीर में इजाफा करते हुए कई गांव अता फरमाए जिनमें हंसासर गांव आदि प्रमुख थे।
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इस घटना के पश्चात बीकानेर रियासत में एक नई परम्परा का जन्म होता है जिसके तहत जब कभी राठौड़ राजदरबार में उनके सम्मानित और वीर दांतत्रता सरदार पधारते तो राठौड़ महाराजा खुद राजगद्दी से आधा उठ उनका स्वागत करते।
दांत्रता वंश के यादव सरदार हमेशा से बीकानेर नरेशों के विश्वासपात्र रहे इसीलिए इन्हे बीकानेर रियासत के राठौड़ राजपूतों का पगड़ी बदल भाई कहा जाता है ।
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ताउम्र हथियारबंद रहे गंगा सिंह जी 1831 में हुए मांढण के समर में अपने रिश्तेदार रेवाड़ी राजवंश के रजवाड़ों की तरफ़ से लड़ते हुए जयपुर वालों की सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। हालांकि वे इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए थे।
उनकी शहादत से पूरा बीकानेर दुखी हुआ था। उनके उदयरामसर स्थित निवास पर ही उनकी रानियों ने दुखी होकर अग्निस्नान करते हुए सती हुई।
दांतत्रता नस्ल के इस ठिकाने में : सरदार हिंदुमल, अजब सिंह, नैन सिंह, अखेसिंह आदि जैसी कई नामी हस्तियां हुई जिनकी सरदारी में बीकानेर का मान बढ़ा।
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आज भी यह गाँव सेना में अपने जबरदस्त सैन्य इतिहास के लिए समूचे बिकानेर में विख्यात है।
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। सिंहनी के जाए शेर अहीर, रणबंके हैं वीर अहीर ।